Israel-Palestine Conflict 2023: A Hindi Explanation

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Israel-Palestine Conflict 2023: A Hindi Explanation

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष 2023: एक हिंदी स्पष्टीकरण

दोस्तों, आजकल आप हर जगह इजरायल और फिलिस्तीन के बीच चल रहे संघर्ष के बारे में सुन रहे होंगे। यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन 2023 में यह और भी गंभीर हो गया है। तो आइए, आज हम इसी जटिल मुद्दे को आसान हिंदी में समझने की कोशिश करते हैं। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि आखिर ये दोनों पक्ष इतने सालों से क्यों लड़ रहे हैं और 2023 में ऐसा क्या हुआ जिसने इस संघर्ष को फिर से भड़का दिया।

संघर्ष की जड़ें: इतिहास का एक लंबा किस्सा

इस इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष की जड़ें बहुत गहरी हैं, जो दशकों, बल्कि सदियों पुराने इतिहास में फैली हुई हैं। यह सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि पहचान, धर्म और राष्ट्रीयता का एक जटिल जाल है । इसकी शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में हुई, जब यहूदी लोग, जिन्हें ज़ायोनिस्ट आंदोलन के नाम से जाना जाता है, यूरोप में उत्पीड़न से बचने के लिए फिलिस्तीन (जो तब ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था) में आकर बसने लगे। वे इस भूमि को अपनी पैतृक मातृभूमि मानते थे, जहाँ उनके प्राचीन मंदिर थे और जहाँ से वे सदियों पहले निर्वासित किए गए थे। दूसरी ओर, उस समय से वहाँ अरब फिलिस्तीनी आबादी भी रह रही थी, जो अपनी ज़मीन और अपने घर को छोड़ने को तैयार नहीं थी।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद, ऑटोमन साम्राज्य का पतन हुआ और ब्रिटिश साम्राज्य ने फिलिस्तीन पर नियंत्रण कर लिया। ब्रिटिशों ने, एक तरफ ज़ायोनिस्टों को यहूदियों के लिए एक राष्ट्रीय घर (National Home) स्थापित करने का वादा किया (बेलफोर घोषणा, 1917), वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अरबों के साथ भी वादे किए। इन विरोधाभासी वादों ने भविष्य के संघर्ष की नींव रख दी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब यहूदियों के नरसंहार (होलोकॉस्ट) ने दुनिया को झकझोर दिया, तो यहूदियों के लिए एक स्वतंत्र राज्य की मांग और तेज़ हो गई। 1947 में, संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को एक अरब राज्य और एक यहूदी राज्य में विभाजित करने की योजना पेश की, जिसमें यरुशलम को एक अंतर्राष्ट्रीय शहर का दर्जा दिया जाना था।

यहूदी नेताओं ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन अरब नेताओं और आसपास के अरब देशों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका मानना था कि यह ज़मीन पर जबरन कब्ज़ा है और यह उन्हें उनकी मातृभूमि से बेदखल करने का एक तरीका है। 1948 में, जब ब्रिटिशों ने अपना शासन समाप्त किया, तो इजरायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसके तुरंत बाद, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाओं ने इजरायल पर हमला कर दिया। इस युद्ध को इजरायल में ‘स्वतंत्रता का युद्ध’ (War of Independence) और फिलिस्तीनियों द्वारा ‘नकबा’ (Nakba - तबाही) कहा जाता है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप, इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित सीमा से अधिक क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया, और लाखों फिलिस्तीनी अपने घरों से बेदखल हो गए, जो आज तक शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। यह वो ऐतिहासिक घाव है जो आज भी रिसता है और वर्तमान संघर्षों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

1967 के युद्ध और उसके बाद का परिदृश्य

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष 1948 में खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह एक नए और अधिक जटिल मोड़ पर पहुँच गया। 1967 का छह दिवसीय युद्ध इस संघर्ष में एक और महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। अरब देशों के बीच बढ़ते तनाव और इजरायल को नष्ट करने की धमकियों के जवाब में, इजरायल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया पर प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक (प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक) की। इस युद्ध में, इजरायल ने न केवल अपनी मौजूदा सीमाओं की रक्षा की, बल्कि वेस्ट बैंक (जॉर्डन से), गाजा पट्टी (मिस्र से), पूर्वी यरुशलम, सीरियाई गोलान हाइट्स और मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप पर भी कब्ज़ा कर लिया।

यह युद्ध इजरायल-फिलिस्तीन संबंध में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी, जिनमें बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी आबादी रहती थी, अब इजरायली सैन्य कब्जे के अधीन आ गए। इजरायल ने इन क्षेत्रों में बस्तियाँ (settlements) बनानी शुरू कर दीं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जाता है, लेकिन इजरायल इस पर आपत्ति जताता है। इन बस्तियों के निर्माण ने फिलिस्तीनियों के लिए भूमि की कमी को और बढ़ा दिया और उनके लिए एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना को और अधिक कठिन बना दिया। पूर्वी यरुशलम पर कब्ज़ा एक विशेष रूप से संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि यह दोनों धर्मों - यहूदियों और मुसलमानों - के लिए एक पवित्र शहर है। इजरायल ने पूर्वी यरुशलम को अपने कब्जे वाले क्षेत्र के रूप में घोषित कर दिया है और इसे अपनी अविभाज्य राजधानी मानता है, जबकि फिलिस्तीनी इसे अपने भविष्य के राज्य की राजधानी बनाना चाहते हैं।

1967 के युद्ध के बाद, फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (PLO) का उदय हुआ, जिसका नेतृत्व यासिर अराफात ने किया। PLO ने इजरायल के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का आह्वान किया और दुनिया भर में कई आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया, जिसने इजरायल और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों को चिंतित कर दिया। वहीं, इजरायल ने अपनी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और फिलिस्तीनी प्रतिरोध को कुचलने के लिए कड़े सैन्य उपाय किए। 1970 के दशक और 1980 के दशक में, दोनों पक्षों के बीच हिंसा का चक्र जारी रहा, जिसमें कई आत्मघाती हमले, इजरायली सैन्य अभियान और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप शामिल थे।

1990 के दशक में, शांति प्रक्रिया की एक उम्मीद जगी। ओस्लो समझौते (Oslo Accords), जो 1993 में हस्ताक्षरित हुए, ने फिलिस्तीनियों को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के कुछ हिस्सों में सीमित स्व-शासन (self-governance) प्रदान किया और इजरायल के अस्तित्व के अधिकार को मान्यता दी। PLO को इजरायल द्वारा एक राजनीतिक भागीदार के रूप में स्वीकार किया गया। ओस्लो समझौते ने एक दो-राज्य समाधान (two-state solution) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दो स्वतंत्र राज्य के रूप में सह-अस्तित्व में रहेंगे। हालांकि, इन समझौतों को पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका। इजरायल द्वारा बस्तियों का विस्तार जारी रहा, फिलिस्तीनी क्षेत्रों में सैन्य नियंत्रण बना रहा, और दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और हिंसा का माहौल कायम रहा। ओस्लो प्रक्रिया के टूटने के बाद, फिलिस्तीनी क्षेत्रों में अल-अक्साIntifada (दूसरी फिलिस्तीनी विद्रोह) जैसी हिंसक झड़पें हुईं, जिसने शांति की किसी भी संभावना को धूमिल कर दिया। यह सब 2023 के संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था।

2023 का संघर्ष: हमास का हमला और इजरायल का जवाब

इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष 2023 में तब और भड़क उठा जब 7 अक्टूबर को हमास, जो गाजा पट्टी पर शासन करने वाला फिलिस्तीनी इस्लामी संगठन है, ने इजरायल पर एक अभूतपूर्व और बड़े पैमाने पर हमला किया। यह हमला अप्रत्याशित था और इसने इजरायल को हिला कर रख दिया। हमास के आतंकवादियों ने गाजा से हजारों रॉकेट दागे और सीमा बाड़ तोड़कर इजरायल के दक्षिणी इलाकों में घुस गए। उन्होंने सैकड़ों इजरायली नागरिकों की हत्या कर दी, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे, और कई लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले गए। इस हमले की क्रूरता और पैमाने ने पूरे विश्व को स्तब्ध कर दिया। इजरायल ने इसे अपने अस्तित्व पर एक सीधा हमला माना और जवाबी कार्रवाई की घोषणा की।

इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ